सप्त दिव्य नामों का व्युत्पत्तिपरक एवं दार्शनिक विवेचन।
सप्त दिव्य नामों का व्युत्पत्तिपरक एवं दार्शनिक विवेचन यथा नाम, तथा गुणाः। इति वदन्ति सर्वे जनाः॥ नाम केवल किसी व्यक्ति अथवा देवता की पहचान नहीं होता, अपितु अनेक बार वह उनके स्वरूप, गुण, सामर्थ्य और तात्त्विक महत्त्व का भी बोध कराता है। भारतीय दार्शनिक परम्परा में देवताओं के नामों की व्युत्पत्ति के साथ-साथ उनके आध्यात्मिक एवं तात्त्विक अर्थों पर भी विचार किया गया है। इसी दृष्टि से निम्नलिखित सात दिव्य नामों का विवेचन प्रस्तुत है। 1. वासुदेव — व्युत्पत्तिपरक एवं दार्शनिक अर्थ व्युत्पत्ति: वासुदेव नाम की व्याख्या विभिन्न पारम्परिक अर्थों में की जाती है। एक भावात्मक व्याख्या संस्कृत की √वस् धातु से सम्बन्धित है, जिसका अर्थ है—निवास करना अथवा स्थित होना। भावार्थ: सर्वभूतेषु वसति इति वासुदेवः—जो समस्त प्राणियों में निवास करता है, वह वासुदेव है। इसी के साथ एक अन्य प्रसिद्ध दार्शनिक भाव यह है कि समस्त प्राणी जिसमें स्थित हैं और जो समस्त प्राणियों में अन्तर्यामी रूप से विद्यमान है, वह वासुदेव है। दार्शनिक तत्त्वार्थ: वासुदेव परमात्मा की सर्वव्यापकता, अन्तर्यामित्व तथा समस्त जगत् के आ...